Wednesday, July 29, 2020

ब्रैस्ट फीडिंग / breast feeding

ब्रैस्ट फीडिंग / breast feeding  

ब्रैस्ट फीडिंग के बहुत सारे लाभ हैं | इससे ना सिर्फ बच्चे बल्कि माँ को भी जीवन भर के स्वास्थ का बढ़ावा देता है | माँ का दूध एक काम्प्लेक्स फार्मूला का दूध होता है साथ वो बच्चे के  लिए जीवित पदार्थ है जो कई रोग से  लड़ने और स्वास्थ को बढ़ावा देता है | माँ का शरीर एंटीबाडी जल्दी बनाता है बच्चे के वनिस्पत और वह बच्चे को सुरक्षा और पोषक तत्वा प्रदान करती है |
जब भी एक बच्चे या माँ किसी नए रोगाणु के संपर्क में आते  है तो  माँ के इम्यून सिस्टम इश रेस्पोंस से एंटीबाडी का निर्माण करता है जो माँ के दूध में जल्द दिख जाता  है | 

शिशु को होने वाले लाभ

  • स्तनपान करने वाले शिशु को जुकाम ,साँस सम्बन्धी इन्फेक्शन , कान में संक्रमण और इन्फ्लुनेज़ा जैसे रोग अपेक्षित कम होते हाँ |
  •  स्तनपान करने वाले  बच्चो में उनके पाचन क्रिया को सुचारू करता है और दुसरे वैसे बच्चे जो स्तनपान नही करते उनमे 16 गुना कम होता है | 
crohon's disease, irritated bowl syndrome,colitis  जैसे रोगों से बचाव होता है |

  • स्तनपान ३ महीने तक किये हुए बच्चो में  जुवेनाइल डायबिटीज का खतरा बिकुल नही रहता या  30 %  कम हो जाता है |
  • यहाँ तक की रिसर्च में हाई ब्लड प्रेशर कोलेस्ट्रोल और ह्रदय रोग तक कम हो जाते हैं 
  • 4 महीने तक के  स्तनपान वाले बच्चो में साँस सम्बन्धी जोखिम का खतरा 72 % कम हो जाता है  |
  • स्तनपान करने वाले शिशु में एलर्जी अस्थमा और स्किन की बीमारी कम हो जाती है |
  • माँ के दूध में फैट लेवल जयादा होता है जो  नर्वस सिस्टम और मस्तिष्क के लिए आवश्यक है |
  • स्तनपान से बच्चो में संतुलित विकास होता है |
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माताओं को मिलने वाले लाभ |

  • स्तनपान से बच्चे और माँ में एक एहसास और  जुडाव बनता है | इसके कारन oxytocin का लेवल उचित अस्तर पर रहता है |और तनाव भी कम हो जाता है | 
  • स्तनपान से महिलाओं में होने वाले कैंसर का खतरा कम हो जाता है |
  • स्तनपान से महिलाओ में होने वाले हड्डी का रोग   osteoporosis  का खतरा कम हो जाता है |
  • स्तनपान से वजन संतुलित होता है |
  • नींद न आने में भी सुधार होता है |
  • स्तनपान कराने वाली माताओं में डिप्रेशन तनाव और चिंता भी काफी हद्द तक कम हो जाता है |
who( वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन )  के मुताबिक स्तनपान  के बढ़ने से बच्चो के स्वस्थ में देखभाल में आने वाली लागत में भी कमी आएगी |






























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Saturday, July 25, 2020

What is hepatitis? and what are Types of hepatitis ?


#Hepatitisvirus
What is hepatitis?  and what are Types of hepatitis ?
Any thing which causes  liver to be inflamed which manifests  as abnormal liver functional test is hepatitis
Commonest  causes of hepatitis is viral hepatitis  the causes are  
alcoholic  
non alcoholic fatty liver diseases
as well as drugs induced.
Viral hepatitis
Hepatitis can be  either  acute  or chronic 
We  need to understand  that different  type of virus causes different  type of viral hepatitis  in which  A  AND  E  cause  acute one  whereas   B and C cause chronic  hepatitis.
Once you have  hepatitis its  lasts  for  less than 6  month  than that is  acute  hepatitis  while 
if you have chronic hepatitis  the  infection lasts for more than 6 month and  keeps on infecting  then it is chronic hepatitis.
Overall  viral Hepatitis is a major health problem in india so much so  that is equals  to big three disease and morbidity caused by malaria tb and  hiv is  equals  to  the death by the  hepatitis  virus alone.
Viral hepatitis have 5  virus   types , it categories into  A B  C  D E .
Hepatitis  D   is not very important as  it hardly exists in our country.
 acute  Hepatitis is broadly classified into two categories  A and E  these are transmitted by faeco-oral  transmission  that’s means by food and  water .
B and c can be clubbed together  these two are transmitted by parental transmission  that means  the blood transfussion  is needed.

Hepatitis A
The over all prevalence  of   Hepatitis A   is  1-2 % in our country.
  seroprevelence : 90 % children have antibodies means  in childhood most of the   people and  children is  getting infected by it  and it is cleared That is asymptomatic .
once  it happens in adult than it can causes serious illness  like liver disease and jaundice
the good  part is  that even in adult  99 %  off the  the virus  is cleared is own while  only 1%  left with some  serious complications..



Hepatitis  A only causes problem in patients who have preexisting liver diseases lets some have CLD kidney diseases  or some other immune compromise situation then only cause serious problem  only in acute situations.
Hepatitis B
is basically prenatally  transmitted virus means it can only transmitted by blood contact by  or  by sexual contact or scratche.
this is both acute and chronic hepatitis

in  acute hepatitis  cases  its 1/4th are caused by  hepatitis B virus.
IN chronic:   60-70 % in india with chronic case are  hepatitis  B as a main  cause.
Hepatitis  B infection commonly leads into chronic  and that turns into  cirrhosis also  hepatic cellular carcinoma.
Hepatitis  C 
again like hepatitis  b  hepatitis c prenatally transmitted  either by  blood  or sexual  contacts.
again hepatitis.B and C  causes  majority of cirrhosis.
C  is also the cause of hepatocelluar carcinoma in india . prevalence of    B  is  more  than c
Both of them are leading cause of morbidity or hepatocellular   cancer in india

Hepatis E
Like hepatitis  A  , hepatitis  E  is  also  caused by contamination of food  and  water.
The prevalence is not very high but happens in epidemic or sporadic like specific area
Like in flood  or rainy seasons OR from one contaminated source.
And  the difference between   A and E , the E  the hepatitis  adds to  more serious , and this  causes acute liver failure
Hepatitis  A is almost self healing in children,but dangerous in adults.



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Friday, July 24, 2020

इम्युनिटी कितने प्रकार के होते हैं ?और कोरोना होने पर इससे कितने दिन के लिए इम्यून रह सकते हैं हमलोग ?

ह्मोयूमोरल इम्युनिटी (humoral immunity ) और दूसरा है सेल मेडीयेटेड (cell mediated immunity) |

ह्मोयूमोरल इम्युनिटी (humoral immunity )क्या होता है ?


आईये  थोडा बिस्तार से जाने , हमारे शरीर में मैक्रोमोलेक्यूलस  होते है जैसे  एंटीबॉडीज, प्रोटीन सप्लीमेंट और कुछ एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड्स | ह्यूमर या ह्मोयूमोरल इम्युनिटी ( इम्यूनिटी को इसलिए नाम दिया गया है क्योंकि इसमें ह्यूमरस (humors)  या शरीर के तरल पदार्थों (body fluids )में पाए जाने वाले तत्व  शामिल होते हैं|


ह्मोयूमोरल इम्युनिटी प्रतिक्रिया में, पहले बी कोशिकाएं (b –c ells ) अस्थि मज्जा (bone marrow) में परिपक्व (matures) होती हैं और बी-सेल रिसेप्टर्स (b-cell receptors/बीसीआर) प्राप्त करती हैं जो कोशिका की सतह पर बड़ी संख्या में प्रदर्शित (imbedded or displayed on cell surfaces) होती हैं।

इन झिल्ली-बद्ध प्रोटीन परिसरों ( membrane  bounded complex  ) में एंटीबॉडी होते हैं जो एंटीजन ( antigens) पहचान के लिए विशिष्ट (specified) होते हैं। प्रत्येक बी सेल में एक अद्वितीय (specific )एंटीबॉडी होता है जो एक एंटीजन के साथ बांधता है। परिपक्व (mature) बी कोशिकाएं अस्थि मज्जा(bone marrow) से लिम्फ नोड्स या अन्य लसीका ( lymphatic organs) अंगों में स्थानांतरित (chanelized ) हो जाती हैं, जहां वे पैथोजेन्स का सामना करना शुरू करते हैं |

बी सेल एक्टिवेशन (activation)
जब बी सेल एक एंटीजन का सामना करता है, तो एंटीजन रिसेप्टर से बंधा होता है और एंडोसाइटोसिस द्वारा बी सेल के अंदर ले जाता है। और एक रिएक्शन करता है |

बी सेल प्रसार( b cell proliferation )
बी सेल परिसर( b – cell  complex)  में बांधने के लिए एक सहायक टी सेल (TH) की प्रतीक्षा करता है। यह बाइंडिंग TH सेल को सक्रिय करेगा, जो तब साइटोकिन्स को रिलीज करता है जो B कोशिकाओं को तेजी से विभाजित करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे B सेल के हजारों समान क्लोन बनते हैं। ये बेटी (  daughter  cells )  कोशिकाएँ या तो प्लाज्मा कोशिकाएँ या मेमोरी कोशिकाएँ बन जाती हैं। मेमोरी बी कोशिकाएं यहां निष्क्रिय रहती हैं; बाद में जब ये मेमोरी बी कोशिकाएँ पुनर्जन्म के कारण एक ही एंटीजन से मिलती हैं, तो वे प्लाज्मा कोशिकाओं को विभाजित करते हैं और बनाते हैं। दूसरी ओर, प्लाज्मा कोशिकाएं बड़ी संख्या में एंटीबॉडी का उत्पादन करती हैं जो कि संचार प्रणाली ( blood stream )में मुक्त होती हैं।

एंटीबॉडी-प्रतिजन प्रतिक्रिया(antigen antibody reaction)
अब ये एंटीबॉडी एंटीजन का सामना करेंगे और उनके साथ बंधेंगे। यह या तो मेजबान (host)  और बाहरी (foreign) कोशिकाओं के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया ( यानी की हमारे शारीर के  सेल और बहरी इन्फेक्टेंट्स ) में हस्तक्षेप करेगा, या वे अपने उचित कार्य में बाधा उत्पन्न करने वाले एंटीजन साइटों के बीच पुल बना सकते हैं, ( यानी  वे एंटीजन के कार्य करने में बाधा उत्पन्न करेगा ) या उनकी उपस्थिति मैक्रोफेज या हत्यारे कोशिकाओं ( किलर सेल्स  मक्रोफगेस ,killer cells / macrophages )  को हमला करने और उन्हें फैलाने के लिए आकर्षित करेगी।

निष्कर्ष :
 हेल्पर टी सेल्स रिलीज़ करता है  इंटरलुकिन 1- 5 जो  बी सेल पर काम करता है और इसको परिपक्व  करता है  प्लाज्मा सेल्स | ये प्लाज्मा सेल्स में  एंटीबाडी से भरा होता है , और यही प्लाज्मा थेरेपी में काम आता है तो आप कह सकते है यही ह्मोयूमोरल इम्युनिटी  काम आता है कोरोना में प्लाज्मा थेरेपी में  |






दूसरा है सेल मेडीयेटेड (cell mediated immunity) |

शारीर में दोनों इम्युनिटी  एक साथ में काम करता है , इसको टी सेल मेडीयेटेड इम्युनिटी भी  कह सकते हैं | इसका काम फागोसाईटोसीस(phagocytosis) करना होता है |

टी सेल अपने इनएक्टिव रूप में रहता है जब तक कोई बाहरी एंटीजन (MHC II)न आये ,और इसके आने पर cytokine रिलीज़ होता है जिसके द्वारा दोनों के बिच संम्बंध अस्थापित होती है ,और एक केमिकल  इंटरलुकिन 1 इस टी सेल्स को उत्तेजित कर हेल्पर टी सेल में बदल देता है | उसके फिर दो प्रकार है cd4  सेल्स और  cd8 सेल्स  |
यह वायरस-संक्रमित कोशिकाओं को हटाने में सबसे प्रभावी है, लेकिन फंगल , प्रोटोजोअंस, कैंसर और इंट्रासेल्युलर बैक्टीरिया के खिलाफ बचाव में भी भाग लेता है। 


कितने दिनों के लिए हमारे एंटीबॉडी हमारी बचाव करेगी |(कोरोना होने के बाद )
अब हमारा सवाल ये है की ये कितने दिन, तो  साधारणतः  कोई भी वायरस के कारन एंटीबाडी 3-4 सीजन तक रहता है और एक सीजन ३-४ महीने का होता है मतलब 9 महीने तक रह सकता है यानी आपको एक  कोरोना हो तो आप कम से कम एक साल तक बच सकते हैं |

अगर हमें हमेशा के लिए इम्यून होना है तो सेल मेडीयेटेड इम्युनिटी जरूरी है |
ऑक्सफ़ोर्ड ने हाल में ही ये दावा किया है की उनके द्वारा बनायीं गयी वैक्सीन में दोनों इम्युनिटी मिलेगी |


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Thursday, July 23, 2020

सोडियम पोटेशियम रक्त परीक्षण क्या है?


सोडियम पोटेशियम रक्त परीक्षण क्या है?

रक्त परीक्षण एक परीक्षण है जहां एक रोगी के रक्त का प्रयोगशाला में विश्लेषण किया जाता है। रक्त का उपयोग शरीर में विभिन्न पोषक तत्वों, एंजाइमों और अन्य पदार्थों को शरीर के चारों ओर ले जाने के लिए किया जाता है। रक्त का उपयोग शरीर से अपशिष्ट को हटाने और उन अंगों तक पहुंचाने के लिए भी किया जाता है जो अपशिष्ट निपटारन के लिए जिम्मेदार होते हैं। एक रक्त परीक्षण आमतौर पर बस कुछ ही मिनट लगते हैं और किसी भी स्थानीय क्लिनिक में पूरा किया जा सकता है। एक मूत्र परीक्षण एक परीक्षण है जहां एक प्रयोगशाला में विश्लेषण के लिए रोगी से मूत्र का एक नमूना एकत्र किया जाता है। मूत्र मानव शरीर में उत्पादित तरल अपशिष्ट है। एक निदान की दृष्टि से, मूत्र महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका उपयोग यह समझने के लिए किया जा सकता है कि रसायन और पदार्थ शरीर को क्या छोड़ रहे हैं।
इलेक्ट्रोलाइट्स मानव शरीर के लिए महत्वपूर्ण पदार्थ हैं जो शारीर  अस्नायु में करंट का संचालन कर सकते हैं। मानव शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन अच्छे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। एक सोडियम पोटेशियम रक्त परीक्षण एक परीक्षण है जिसका उपयोग रक्त में इन विशिष्ट इलेक्ट्रोलाइट्स की मात्रा की जांच करने के लिए किया जाता है। सोडियम और पोटेशियम मानव शरीर के सबसे महत्वपूर्ण इलेक्ट्रोलाइट्स में से दो हैं। सोडियम पोटेशियम का स्तर वास्तव में प्रयोगशाला में अलग से परीक्षण किया जाता है। सोडियम पोटेशियम रक्त परीक्षण आमतौर पर रक्त के एक एकल नमूने पर आयोजित किया जाता है जिसे कई अन्य घटकों और विशेषताओं के लिए भी परीक्षण किया जा सकता है। रक्त की गुणवत्ता और घटक व्यक्ति के स्वास्थ्य का संकेत है और व्यक्ति के शरीर में क्या चल रहा है।

यदि गुर्दे की कार्यप्रणाली में कोई समस्या है तो सोडियम पोटेशियम रक्त परीक्षण या सोडियम पोटेशियम मूत्र परीक्षण किया जा सकता है। इन दोनों इलेक्ट्रोलाइट्स को आमतौर पर गुर्दे के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। जब ये अंग ठीक से काम करना बंद कर देते हैं, तो सोडियम पोटेशियम लैब टेस्ट असामान्य परिणाम के साथ वापस आ सकता है। सोडियम पोटेशियम रक्त परीक्षण से असामान्य परिणामों के लिए व्यक्ति के शरीर का अनुचित जलयोजन भी जिम्मेदार हो सकता है। यह तब भी हो सकता है जब व्यक्ति डायरिया या उल्टी से पीड़ित हो। यही कारण है कि इन रोगियों को इलेक्ट्रोलाइट पेय दिया जाता है।

कई अन्य स्थितियां भी हैं जिनके कारण सोडियम या पोटेशियम का स्तर असामान्य हो सकता है। बढे हुए सोडियम पोटेशियम का स्तर और घटे हुए  सोडियम पोटेशियम का स्तर दोनों ही चिंता का कारण हैं और इसे जल्द से जल्द ठीक किया जाना चाहिए। 


पोटेशियम का स्तर कम होने पर क्या होता है?

कम पोटेशियम होने के कई कारण होते हैं, लेकिन आमतौर पर उल्टी, दस्त, अधिवृक्क ग्रंथि विकार(adrinal gland disease) या मूत्रवर्धक(diuretics) का प्रयोग कारण हो सकते हैं। कम पोटेशियम का स्तर मांसपेशियों में  कमजोरी महसूस करा सकता है, ऐंठन,जकडन, यहां तक कि लकवाग्रस्त करा सकता है, और असामान्य हृदय ताल भी विकसित हो सकता है।

हाइपरक्लेमिया या पोटैशियम का अस्तर ज्यादा होने पर क्या हो सकता है?

हाइपरकेलेमिया का मतलब है आपके खून में पोटेशियम का स्तर बहुत अधिक है, तो आप दिल की धड़कन, सांस की तकलीफ, सीने में दर्द, मतली या उल्टी महसूस कर सकते हैं। अचानक या गंभीर हाइपरकेलेमिया एक जीवनघात की स्थिति है |
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Wednesday, July 22, 2020

बाइपोलर डिसऑर्डर क्या होता है ?


 मेडिकल जगत में बहुत प्रकार के रोग हैं, परंतु कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनसे छुटकारा पाना आसान नहीं होता क्यूंकि  रोग शारीरिक न होकर मानसिक जब हो तो रोगी इससे अनभिज्ञ होता है । इसी प्रकार का एक मानसिक रोग है | जिसका नाम बाइपोलर डिसऑर्डर है (Bipolar disorder).

बाइपोलर डिसऑर्डर क्या होता है ?
यह एक तरह का मानसिक रोग है, जिसमें मन लगातार कई हफ़्तो या महिनों तक या तो उदास और दुखी रहता है या फिर बेहद खुश रहता है । उदासीनता की स्थिति में नेगेटिव विचार आते हैं । यह एक ऐसा रोग है जो 100 लोगों में से किसी एक इंसान को कभी न कभी होता है । 

 14 से 19 साल के बीच के बच्चों में यह बीमारी देखी जाती है जिसमे महिला और पुरुष दोनों प्रभावित होते हैं । इस रोग की विशेषता है की  40 साल होने के बाद इसके होने की संभावना कम हो जाती है ।

मानसिक रोग, है तो ये दो अलग शब्द पर ये एक बड़े मानसिक विकार को जोड़ते हैं । एक का मतलब है मनोदशा में बदलाव, जो प्राकृतिक होता है ब्यक्ति का है और दूसरा है अवसाद यानि उदासीनता । ये दो विकार व्यक्ति में बाइपोलर डिसऑर्डर को जन्म देते हैं । 
बाइपोलर डिसऑर्डर के शिकार व्यक्ति को समाज से संबंध बनाए रखने और काम करने में बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है ।
बाइपोलर डिसऑर्डर के लक्षण क्या होते हैं ?
क्यूंकि ,बाइपोलर डिस्ऑर्डर एक मानसिक रोग है, इसलिए इसके बहुत अधिक लक्षण नहीं है,लेकिन जो लक्षण है, उससे आप आसानी से इसका पता लगा सकते हैं और आपको रोगी में इसके लक्षण का आभास हो जाएगा । अगर आप किसी व्यक्ति के साथी हैं और वह इस रोग से ग्रसित है तो आपको इसके लक्षण की पहचान हो जाएगी| आपको लगेगा ये अचानक क्या हो गया इसे |
एक मिनट या पल-पल में मूड का बदलना 

“पल में शोला पल में माशा “ ये गाना तो आपने सुना तो होगा ही वही हाल होता है |
 उस व्यक्ति के स्वभाव में पल-पल बदलाव आ रहा है, यानी कभी वो बहुत खुश और कभी बेहद दुखी हो रहा है और यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो ये बाइपोलर डिसऑर्डर ही है  है ।
यह एक ऐसी स्थिति होती है जहाँ रोगी एक समय पर अकारण ही आनंद से भरा रहता है और दूसरे ही पल डिप्रेस्ड हो जाता  है । 
इसका अगर उदाहरण दिया जाए तो - रोगी किसी भी बात पर हंस सकते हैं और दुसरे ही पल  बहुत उदास या बेहद दुखी हो सकते हैं, लगता है मानो वह सामान्य स्थिति में नहीं हैं ।

हड़बड़ी करना, तेज़ी से रुपए खर्च करना

चलते-चलते एक एक बहुत अधिक गति में आ जाना, बाज़ार में अचानक धड़ल्ले से खरीदीरी शुरु कर देना, विचलित हो जाना भी बाइपोलर डिसऑर्डर का ही लक्षण है ।
इस मानसिक रोगी  के लिए आजतक किसी दवा ने बहुत अधिक सफलता प्राप्त नहीं की है, लेकिन एक सत्यं यह भी है कि दवाएं कुछ हद तक मरीज की  सहायता अवश्य ही करती हैं ।
 बाइपोलर डिसऑर्डर का इलाज क्या है ?
बाइपोलर डिसऑर्डर के उपचार करने और इसे ठीक करने के लिए अलग-अलग प्रकार की थेरेपी हैं । पर अभी तक एकमात्र ऐसी चिकित्सा है जिसके बल पर रोगी से बात करने और उसका पूरा ध्यान नकारात्मक यानी नेगेटिव विचारों, भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और व्यवहार से हटाने में सफलता मिली है।

मानसिक शिक्षा 
मनोशिक्षा चिकित्सा का ही अंग  है । इस तरह की चिकित्सा रोगी की मन: स्थिति को सशक्त बनाने पर केंद्रित करती है और यह रोगी को आत्मविश्वास से  भर देती है ।इस तरह उसके मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि होती है और वह सामान्य होना शुरु कर देता है| 
फैमिली थेरेपी 
यह थेरेपी एक मनोवैज्ञानिक प्रैक्टिस यानि अभ्यास है ।  रोगी के परिवार के सदस्योंऔर उसके चाहने वाले मित्रों आदि को इकट्ठा कराकर आपसी मनमुटाव को हल करने की कोशिश की जाती है । यह थेरेपी परिवार और रोगी के बीच नईं नींव रखती है और रोगी के मुद्दों को समझने के लिए परिवार वालों को सक्षम बनाती है ।

मनोचिकित्सा से  बेहतर हो होमियोपैथ के  अच्छे डॉक्टर जो मानसिक लक्षण को देख कर इलाज़ करते हैं उनसे मिले और अपना केस दें |
यह एक टॉक थेरेपी होती है जो विशेष रूप से रोगी के मानसिक और व्यवहार संबंधी विकारों पर केंद्रित होती है ।

दवाओं के द्वारा उपचार 
पश्चात् चिकित्सा में इसका कोई सटीक इलाज़ नही है पर अगर किसी अच्छे होमियोपैथ चिकित्सक से मिले जो मनसिक लक्षण के आधार पर चिकित्सा करता है तो वो रोग के बारीक़ लक्षणों को देख कर रोगी को सदाके लिए निरोगी कर सकता है |

निष्कर्ष
  बाइपोलर डिसऑर्डर का इलाज धीमा होता है और ऐसे में रोगी और परिवार जनों को धैर्य रखने की आवश्यकता होती है |
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Tuesday, July 21, 2020

आखिर घुटनों में दर्द क्यूँ होता है ?

आखिर घुटनों  में दर्द क्यूँ होता है ?
घुटने शरीर का वो अंग हैं  जो हमारे पुरे शरीर का भर उठता है या यु कहें  की घुटना हमारे लिए वेटलिफ्टर का काम करना है तो ये बात ज्यादा अहमियत रखेगा क्यूँ की हम।रा वजन उसी पर टिकता है घुटने की हड्डी को जोड़ने वाले सिरे में एक तरह का कार्टिलेज होती है जो चिकनी और रबर के सामान मुलायम टिश्यू का एक समूह होती है और यह घुटनों के सही से चलाने में मदद करती है । 
चोट लगने से इस कार्टिलेज को नुकसान होता हैया बुढ़ापा के कारण यह कार्टिलेज धीरे-धीरे घिसने लगता है और घुटने के दर्द या सुजन शुरु हो जाती है । परंतु ऐसा कईं बार देखा गया है कि किसी प्रकार की चोट न लगने के बावजूद भी लोग अर्थराइटिस और कईं तरह के रोगों से पीड़ित हो रहे हैं । ऐसा इसलिए हैं क्योंकि इसके और भी कारण हैंआइए जानते हैं वो कारण और क्या हैं 


मोटापा या वजन अधिक होना : इस बात का आप अवश्य ध्यान रखिए कि यदि आपका वजन अधिक है या आप किसी प्रकार से मोटापे के शिकार हैं तो भविष्य में पूरी उम्मीद है कि आपको घुटनों या जोड़ों में दर्द हो सकता है । ऐसा इसीलिए है क्योंकि अगर आपके शरीर का वज़न ज़्यादा है तो शरीर का सारा वज़न घुटनों पर होगा और इसवजह से घुटनों में दर्द होगा ही  
पैरों की कमज़ोरी के कारण : कुछ लोगों के पैरों में कुछ कमज़ोरी होती है, जैसे उनके पैर सीधे न होकर थोड़े टेड़े या मुड़े होते हैं तो ऐसे में शरीर का वजन एक ही घुटने पर  जाता है, जिससे घुटनों में दर्द और गठिया होने की संभावना बढ़ जाती है । पैर की ऐसी कमज़ोरियां सर्जरी द्वारा ठीक हो सकती है ओर्थपेडीक डॉक्टर से मिल कर इसका समाधान कराएँ |
कुछ कामों के कारण कुछ ऐसे काम , धंधे होते हैं जिसमें घुटनों के सहारे या पैरों को मोड़कर पूरे दिन बैठना पड़ता है, जैसे कारपेंटर, इलेक्ट्रीशियन, दुकानदार ऑफिस में भी पुरे दिन काम करने वाले  आदि । पूरे दिन घुटनों को मोड़कर रखने से ऐसे लोगों में घुटनों के दर्द की संभावना अधिक हो जाती है, परंतु फिज़ियोथैरेपी और नियमित व्यायाम की सहायता से इस समस्या से राहत मिल सकती है । फिर भी ठीक न हो तो डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं 
संक्रमण के कारण: कभी-कभी टीबी और बैक्टीरियल संक्रमण की वजह से भी घुटनों से जुड़ी दिक्कतें आ सकती हैं । इंन्फेक्शन की वजह से घुटनों में दर्द, सूजन मोच या फिर  अकड़न आने की शिकायतहो सकती है ।ऐसे में दर्द का कारण जानने के लिएखून की जांच, एक्स-रे, एमआरआई स्कैन आदि कराना पड़ता है । योग्य चिकित्सक से मिल कर इसका उपचार जाने |
ट्यूमर: घुटनों में दर्द या सूजन आना कभी-कभी कैंसर के लक्षण भी हो सकते हैं । यदि शरीर में कैंसर या ट्यूमर जन्म ले चुका है तब भी यह होता हैं, परंतु ऐसे में लोग इसे पहचान नहीं पाते । कैंसर या ट्यूमर की वजह से हो रहे घुटनों के दर्द से छुटकारा एक्स-रे, एमआरआई स्कैन, बायोप्सी या सर्जरी द्वारा संभव है ज्यादातर ये कंधे में होता पर कुछ घुटने में भी देखे गये हैं |
अधिक जिम या कसरत के कारण:हर व्यक्ति अपने पूरे जीवन में फीट रहना चाहता है और बढ़ती उम्र के साथ फिट रहना एक चुनौती है, लेकिन कभी-कभी कुछ लोग फिट रहने के चलते अपनी उम्र और शारीरिक क्षमता से अधिक उछल-कूद जिम मेकरते हैं, जिनसेउन्हें घुटनों की समस्या होनी शुरु हो जाती है । वजन सोच समझ कर उठायें अगर जिम में जाते हैं तो |
ओस्टियोअर्थराइटिस : कुछ केसों में कार्टिलेज पूरी तरह घिस जाता या खराब  हो जाती है और घुटनों में अकड़न के साथ पीड़ा का अनुभव होता है, इसे ही ओस्टियो अर्थराइटिस कहते हैं, यह बहुत पीड़ादायक क्षण है, परंतु यदि भार को नियंत्रित किया जाए,फिज़ियोथैरेपी के साथ सही दवाइयां ले ली जाए तो, इससे बचा जा सकता है ।इस जगह पर होमियोपैथी दावा काफी कारगर हो सकती है |
दिनचर्या में लायें बदलाव :
घुटनों में दर्द होना कोई बीमारी नहीं है, बल्कि ख़राब  जीवनशैली का ही परिणाम है ।इससे पूरी तरह बचा जा सकता है, बस शर्त इतनी है कि लोगों को अपने जीने के तौर तरीके को बदलकर हेल्दी लाइफस्टाइल फॉलो करें  :
डाइट में जितना हो सके कैल्शियम को शामिल करें और इसके अलावा बादाम, सोया और हरी सब्ज़ियों का सेवन करें । याद रखिए फैट बढ़ाने वाली भोजन न लें  ।
विटामिन-डी का भोजन में भरपूर प्रयोग करें, इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में धूप लें । विटामिन- डी की कमी को पूरा करने के लिए अंडों का भी भरपूर सेवन करें ।
मोटापा या अधिक वज़न हैं तो उसे नियंत्रित करें । योग करें, व्यायाम करें, पानी अधिक पीएं और जितना हो सके फैट बढ़ाने वाले भोजन से दूर रहें ।डब्बा बंद खाना या जिसमे रसायन हो वो न लें |
ध्यान रहें कि अगर दौड़ लगा रहे हैं तो घास, रेत या बालू वाली सतह पर ही दौड़ें, किसी सीमेंट वाली या ठोस जगह पर न दौड़ें, घुटनों पर दबाव आता है, जिससे तकलीफ हो सकती है ।आज कल लोग सड़क पर ख़राब जूते पहन कर या नंगे पैर दौड़ रहे जो बिलकुल गलत है
घुटनों में दर्द, सूजन यदि लंबे समय तक रहती है तो इसे हल्के में न लें, फौरन किसी ऑर्थोपेडिक यानी  हड्डी रोग के विशेषज्ञ से कंसल्टेशन का समय लें  ।
विटामिन डी ३ की समय समय पर जांच और  थाइरोइड पर भी ध्यान देना जरूरी है |  


 घुटनों के दर्द के लिए 5 एक्सरसाइज़
1.प्लैंक  अगर आपका पेट मज़ूबत है यानी आपका पेट दबाव झेल सकता है तो या यु कहें की पेट बाहर नही निकला है तो यह आपके घुटनों पर दवाब नहीं आने देगा । प्लैंक एक्सरसाइज़ सही आकार विकसित करने में मदद कर सकता है और मांसपेशियों की थकावट को दूर करता है । अगर आपका आकार सही नहीं है तो यह चीज़ आपके घुटनों पर दवाब बढ़ा देती है। 
2.स्टेप अप्स : यह एक्सरसाइज़ जोड़ों पर दवाब आने नहीं देती । अपने बाएं पैर को किसी दिवार बैंच पर रखें और शरीर को ऊपर की ओर उठाएं । कुछ समय तक इसी अवस्था में रहें, इसके बाद पैर को नीचे लाएं और फिर दाएं पैर से इस प्रक्रिया को दोहराएं । इसमें धयान रखने योह है दिवार और बेंच की उचाई उचीत ही हो जिससे घुटनों पर जोर न पड़े |
3.स्कवॉट : यह एक्सरसाइज़ घुटनों पर दवाब को कम करती हैं और मांसपेशियों को बेहतर बनाने में मदद करती हैं । अपने दोनों हाथ सामने की ओर रखें। छाती को बाहर निकालते हुए सीधा खड़ा हो जाएं, धीरे से घुटनों को इस प्रकार मोड़ें जैसे आप कुर्सी पर बैठते हैं। ये ब्यायाम सबसे उपयुक्त है | ये सभी कर सकते और बिना जोखिम के  | 
4.घुटने मोड़ें  यह एक बहुत कारगर और पुरानी एक्सरसाइज़ है । यह बेजान हो चुकीं मांसपेशियों को सक्रिय करने में मदद करती हैं। ये आपके घुटनों को सक्रिय बनाने में मदद करती हैं। आप सबसे पहले एक पैर पर खड़े हो जाएं, कूल्हों को पीछे की ओर धकेलें, छाती को आगे की ओर ले जाएं, अब धीरे से घुटनों को मोड़ें । इस अवस्था में कम से कम 10 सेंकेंड तक रहें। ज्यादा बुजुर्ग लोग इसे देख रेख में ही करें |
5.नी- एक्सटेंशन एक्सरसाइज़ :इस एक्सरसाइज़ की सबसे बड़ी खूबी है कि यह घुटनों में रक्त प्रवाह को रुकने नहीं देती, उसे एक्टिव रखती है । इसके लिए आप एक पैर पर खड़े हो जाएं, फिर 90 डिग्री के एंगल से पैर को उठाएं, इसके बाद 10 सेंकेंड तक पैर को उठाएं और फिर ऐसे ही वापस लायें । 

  

कब करें आइसिंग और कब करें गर्म सिकाई

यह एक आवश्यक सूचना है ।
घुटनों की सिकाई करने की लोगों को जानकारी नहीं होती । घुटनों या शरीर के किसी भी भाग में कोई दर्द हो, वह बिना जाने उसकी सिकाई शुरु कर देते हैं । याद रखिए कि अगर घुटने में दर्द अधिक हो तो आइसिंग यानि बर्फ की सिकाई करनी चाहिए ।
अगर दर्द का चोट पुरानी और सहन योग्य है, तब गर्म पानी की सिकाई करना ठीक है। याद रहे कि अगर घुटनों में चोट लगी है, कोई अंदरुनी घाव है जो पीड़ा दे रहा है तो उस समय आइसिंग का प्रयोग करें और अगर दर्द पुराना है तो गर्म या गुनगुने पानी से सिकाई करें
दवाईयों का अधिक सेवन किडनी और लीवर को डैमेज कर सकता है। 

घुटने के दर्द में सोयें कैसे |

तकिए का सहारा
घुटनों के दर्द में एक आरामदायक नींद के लिएआप तकिए का उपयोग कर सकते हैं ।आप तकिए को लगा सकते हैं:
अपने घुटनों के बीच, यदि आप सीधे सोते हैं ।
अपने घुटनों के नीचे, अगर आप अपनी पीठ के बल सोते हैं ।
 गर्मी और सर्दी
गर्मी और ठंड आपको दर्द और सूजन का प्रबंधन करने में मदद कर सकती हैं।
निम्नलिखित टिप्स मदद कर सकती हैं:
बिस्तर में जाने से 15-20 मिनट से पहले हीटिंग पैड या आइस पैक का प्रयोग करें।
रात के समय गर्म पानी की बोतल से सेक कर सकते हैं

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